त्रयोदशी (13वीं तिथि), दोनों पक्ष
प्रदोष व्रत
प्रदोषम के नाम से भी जाना जाता है
प्रदोष व्रत प्रत्येक पखवाड़े की तेरहवीं तिथि (त्रयोदशी) को भगवान शिव के सम्मान में रखा जाता है, जिनकी पूजा प्रदोष काल (सूर्यास्त के आसपास के लगभग 90 मिनट) में की जाती है। वार के अनुसार इसका विशेष नाम होता है (सोमवार को सोम प्रदोष, शनिवार को शनि प्रदोष आदि)।
2026 में प्रदोष व्रत की तारीखें
सूर्योदय-व्यापिनी तिथि (स्मार्त परंपरा) के अनुसार उज्जैन के लिए गणना; क्षेत्रीय आधार पर एक दिन का अंतर संभव है।
प्रत्येक प्रदोष व्रत पर चंद्रमा — त्रयोदशी (13वीं तिथि), दोनों पक्ष।
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महत्व
संध्या वेला, जब दिन और रात का मिलन होता है, माना जाता है कि उस समय भगवान शिव आनंद तांडव करते हैं, जिससे प्रदोष काल उनकी उपासना के लिए अत्यंत फलदायी बन जाता है। यह व्रत आरोग्य, सुख-समृद्धि और कष्टों से मुक्ति के लिए रखा जाता है।
प्रदोष व्रत की व्रत व पूजन विधि
श्रद्धालु दिन भर उपवास रखते हैं और शाम को गोधूलि वेला में शिवलिंग का जल व दूध से अभिषेक कर, बेलपत्र अर्पित कर शिव जी की पूजा करते हैं, और प्रदोष पूजा के बाद व्रत खोलते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रदोष पूजा कब की जाती है?
प्रदोष काल में, त्रयोदशी तिथि पर सूर्यास्त के आसपास लगभग 90 मिनट की अवधि में।
शनि प्रदोष क्या है?
शनिवार को पड़ने वाला प्रदोष व्रत, यह विशेष रूप से प्रभावशाली माना जाता है, खासकर शनि के कष्टों और साढ़ेसाती से राहत पाने के लिए।
प्रदोष व्रत कितनी बार आता है?
महीने में दो बार, प्रत्येक पक्ष की त्रयोदशी तिथि को।
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