वैदिक ज्योतिष
12 प्रकार के कालसर्प दोष
कालसर्प योग तब बनता है जब सभी सात ग्रह राहु और केतु की धुरी के एक तरफ हों। इसके 12 प्रकार राहु के भाव के अनुसार होते हैं। वे धुरी से जुड़े जीवन क्षेत्रों को दिखाते हैं, भाग्य या दुर्भाग्य का फैसला नहीं। हर प्रकार पढ़ें या अपनी कुंडली जांचें।
कालसर्प योग एक कुंडली संरचना (पैटर्न) है (जिसमें सभी सात ग्रह राहु-केतु अक्ष के एक ओर स्थित होते हैं) यह कोई शाप या दुर्भाग्य की गारंटी नहीं है। इसका प्रभाव ग्रहों के बल, स्थिति और पूरी कुंडली पर निर्भर करता है, और कई सफल व प्रतिष्ठित व्यक्तियों की कुंडली में यह योग उपस्थित रहा है। यदि एक भी ग्रह इस अक्ष से बाहर हो, तो यह योग आंशिक होता है या बिल्कुल नहीं बनता। Astroyana इसे बिना किसी भय और तथ्यात्मक रूप से प्रस्तुत करता है, और एक पूर्ण व सार्थक जीवन जीने के लिए किसी विशेष उपाय की अनिवार्यता नहीं है।
प्रथम-सप्तम भाव
अनंत कालसर्प योग
अनंत कालसर्प तब बनता है जब राहु प्रथम भाव (लग्न) में और केतु सप्तम भाव में स्थित हों, और बाकी सातों ग्रह इनके बीच घिरे हों। यह अक्ष स्वयं (प्रथम भाव) और साझेदारी व वैवाहिक संबंधों (सप्तम भाव) को जोड़ता है, इसलिए व्यक्तिगत पहचान, आत्म-छवि और पारस्परिक संबंध इसके प्रमुख विषय हैं, जो सचेत संतुलन की मांग करते हैं।
दोष का विवरण पढ़ेंद्वितीय-अष्टम भाव
कुलिक कालसर्प योग
कुलिक कालसर्प तब बनता है जब राहु द्वितीय भाव में और केतु अष्टम भाव में स्थित हों, और अन्य ग्रह इनके मध्य हों। यह अक्ष धन, परिवार और वाणी (द्वितीय भाव) तथा रूपांतरण, पैतृक संपत्ति और गूढ़ विद्या (अष्टम भाव) को जोड़ता है, इसलिए वित्त, पारिवारिक संबंध और अप्रत्याशित परिवर्तन इसके मुख्य विषय हैं।
दोष का विवरण पढ़ेंतृतीय-नवम भाव
वासुकी कालसर्प योग
वासुकी कालसर्प तब बनता है जब राहु तृतीय भाव में और केतु नवम भाव में स्थित हों। यह अक्ष पराक्रम, पुरुषार्थ और संवाद (तृतीय भाव) तथा भाग्य, धर्म और मान्यताओं (नवम भाव) को जोड़ता है। उपचय (वृद्धि) भाव में राहु की स्थिति इसे अधिक रचनात्मक रूपों में से एक बनाती है।
दोष का विवरण पढ़ेंचतुर्थ-दशम भाव
शंखपाल कालसर्प योग
शंखपाल कालसर्प तब बनता है जब राहु चतुर्थ भाव में और केतु दशम भाव में स्थित हों। यह अक्ष गृह, माता और मानसिक शांति (चतुर्थ भाव) तथा करियर व सामाजिक प्रतिष्ठा (दशम भाव) को जोड़ता है, इसलिए निजी सुरक्षा और सार्वजनिक महत्वाकांक्षा के बीच संतुलन साधना केंद्रीय बिंदु है।
दोष का विवरण पढ़ेंपंचम-एकादश भाव
पद्म कालसर्प योग
पद्म कालसर्प तब बनता है जब राहु पंचम भाव में और केतु एकादश भाव में स्थित हों। यह अक्ष रचनात्मकता, संतान और बुद्धि (पंचम भाव) तथा लाभ, सामाजिक दायरे और आकांक्षाओं (एकादश भाव) को जोड़ता है, इसलिए विद्या, रचनात्मकता और लक्ष्यों की प्राप्ति इसके मुख्य विषय हैं।
दोष का विवरण पढ़ेंषष्ठ-द्वादश भाव
महापद्म कालसर्प योग
महापद्म कालसर्प तब बनता है जब राहु षष्ठ भाव में और केतु द्वादश भाव में स्थित हों। यह अक्ष स्वास्थ्य, प्रतिस्पर्धा और सेवा (षष्ठ भाव) तथा व्यय, आध्यात्मिकता और विदेश (द्वादश भाव) को जोड़ता है। उपचय भाव में राहु की स्थिति बाधाओं को पार करने के लिए पारंपरिक रूप से अनुकूल मानी जाती है।
दोष का विवरण पढ़ेंसप्तम-प्रथम भाव
तक्षक कालसर्प योग
तक्षक कालसर्प तब बनता है जब राहु सप्तम भाव में और केतु प्रथम भाव में स्थित हों। यह अक्ष साझेदारी, विवाह और व्यवसाय (सप्तम भाव) तथा स्वयं (प्रथम भाव) को जोड़ता है, इसलिए संबंध और व्यावसायिक साझेदारियां आत्म-विकास का मुख्य क्षेत्र बनती हैं।
दोष का विवरण पढ़ेंअष्टम-द्वितीय भाव
कर्कोटक कालसर्प योग
कर्कोटक कालसर्प तब बनता है जब राहु अष्टम भाव में और केतु द्वितीय भाव में स्थित हों। यह अक्ष रूपांतरण, गूढ़ ज्ञान और अप्रत्याशित घटनाओं (अष्टम भाव) तथा धन, परिवार और वाणी (द्वितीय भाव) को जोड़ता है, इसलिए आकस्मिक परिवर्तन और जीवन के गहरे पहलू इसके विषय हैं।
दोष का विवरण पढ़ेंनवम-तृतीय भाव
शंखचूड़ कालसर्प योग
शंखचूड़ कालसर्प तब बनता है जब राहु नवम भाव में और केतु तृतीय भाव में स्थित हों। यह अक्ष भाग्य, धर्म और पिता (नवम भाव) तथा साहस, पुरुषार्थ और सहोदर (तृतीय भाव) को जोड़ता है, इसलिए मान्यताएं, उच्च शिक्षा और भाग्य का विचार केंद्रीय हैं।
दोष का विवरण पढ़ेंदशम-चतुर्थ भाव
घातक कालसर्प योग
घातक कालसर्प तब बनता है जब राहु दशम भाव में और केतु चतुर्थ भाव में स्थित हों। यह अक्ष करियर और सामाजिक प्रतिष्ठा (दशम भाव) तथा गृह, माता और शांति (चतुर्थ भाव) को जोड़ता है। उपचय भाव में राहु की स्थिति इसे करियर को आगे बढ़ाने वाले अधिक महत्वाकांक्षी रूपों में शामिल करती है।
दोष का विवरण पढ़ेंएकादश-पंचम भाव
विषधर कालसर्प योग
विषधर कालसर्प तब बनता है जब राहु एकादश भाव में और केतु पंचम भाव में स्थित हों। यह अक्ष लाभ, सामाजिक नेटवर्क और आकांक्षाओं (एकादश भाव) तथा रचनात्मकता, संतान और बुद्धि (पंचम भाव) को जोड़ता है। उपचय भाव में राहु लाभ और सफलता की इच्छा को मजबूती देता है।
दोष का विवरण पढ़ेंद्वादश-षष्ठ भाव
शेषनाग कालसर्प योग
शेषनाग कालसर्प तब बनता है जब राहु द्वादश भाव में और केतु षष्ठ भाव में स्थित हों। यह अक्ष व्यय, विदेशी संबंध और आध्यात्मिकता (द्वादश भाव) तथा स्वास्थ्य, सेवा और प्रतिस्पर्धा (षष्ठ भाव) को जोड़ता है, इसलिए त्याग, विदेश यात्रा और छिपी बाधाओं को पार करना इसके पहलू हैं।
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